Sakunat History World | Indian, World & Mewat History in Hindi

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Monday, November 18, 2024

 

best place mewat

आज की यात्रा सूरू करते हैं जयपुर 2 मेवात तक चाहे आप राजपूतों के इतिहास में रुचि रखते हों या mewat history-shad ki bethak अरावली पहाड़ों के दृश्य में, राजस्थान राज्य में देश में घूमने के लिए कुछ best place हैं। जयपुर, या गुलाबी शहर, राजस्थान राज्य की राजधानी है और अपनी यात्रा शुरू करने के लिए एक शानदार जगह है। जयपुर को इसकी इमारतों की प्रमुख रंग योजना के कारण गुलाबी शहर के रूप में भी जाना जाता है।


जयपुर पश्चिमी भारतीय राज्य राजस्थान के जयपुर क्षेत्र में भी स्थित है। जयपुर शहर पुलिस विभाग राजस्थान राज्य के राज्य विभाग द्वारा प्रशासित है। जयपुर भारत का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है और स्वर्ण त्रिभुज का हिस्सा है।

जयपुर कई आश्चर्यजनक वास्तुशिल्प संरचनाओं का घर है, जिनमें तीन किले, कई मंदिर और आश्चर्यजनक सिटी पैलेस शामिल हैं। हजारों मंदिरों के कारण वाराणसी को "मंदिरों का शहर" कहा जाता है। 400 साल पहले निर्मित, स्वर्ण मंदिर वास्तव में सुनहरा है और हमेशा पूरे देश और दुनिया के बाकी हिस्सों से आने वाले सिखों से भरा होता है।

shad ki bethak अब हम मेवात के नूंह शहर से अपनी यात्रा सूरू करते हैं  । अपनी अद्भुत मीनारों, राजपूत और मुस्लिम वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध शेख मूसा के मकबरे पर जाएँ। शेख मूसा का मकबरा नूंह क्षेत्र में एक और शानदार आकर्षण है जिसे हम चूक गए क्योंकि हमारे अन्वेषण के तरीके ने भीषण गर्मी में पीछे की सीट ले ली। इसका इतिहास और खूबसूरती best place mewat मेवात में घूमने के लिए shad ki bethak 01 देखने के लायक है, अगर आप नूंह शहर आ रहे हैं, तो एक बार मूसा के मकबरा पै जरूर जाएं।

 

Shad Ki Bethak का इतिहास best place mewat

दिल्ली से 125 और फिरोजपुर झिरका से 15 किलोमीटर दूर इब्राहिम बास में मौजूद है साद की बैठक। shad ki bethak वैसे तो ज्यादा हमें कहीं मिला भी नहीं है। जब ग्रामीणों से हमने इनके बारे में जानकारी इकट्ठी की, तो उन्होंने बताया के 600 साल पहले best place mewat 15 छोटे-छोटे कबीले हुआ करते थे जो आज तो एक बड़े गांव का रूप ले चुके हैं।

15 कबीले के सरदार का नाम था साद। लेकिन इन 15 कबीलो मैं सबसे अलग बात यह थी, कि यह अरावली पर्वत की संख्या, यानी जो अरावली का पहाड़ है।  7 कबीले एक् साइड हैं तो 8 कबीले दूसरी साइड हैं। सरदार साद को एक कबीले से दूसरे कबीले मैं जाने के लिए 20 से 30 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता था। जो बहुत मुश्किल भरा कार्य हुआ था। बाद में फिर सरदार ने खुद अरावली के पर्वत पर एक ऐसी बैठक shad ki bethak बनाई जो बहुत ही भव्य और खूबसूरत थी|



इसके लिए उन्होंने पहाड़ के दोनों साइड।  ऊपर तक सीढ़ी बना डाली थी। जो आज तक भी मौजूद है। इन सीडीओ की खास बात यह है। इनके ऊपर से आज भी ऊंट घोड़े हाथी या कोई भी आप भारी-भरकम सामान अपने सर के ऊपर रखकर ले जा सकते हैं आपको पता भी नहीं चलेगा कि आप सीढ़ियों के ऊपर चल रहे हैं क्योंकि इनको डिजाइन इस तरीके से किया गया है। अगर आप फिरोजपुर के साइड आ रहे हैं तो आपको साद की बैठक ( best place mewat Shad Ki Bethak )जरूर देखनी चाहिए।


 

चूयमल तालाब Chuimal Taalab Ka Itihaas mewat history

नूंह की हमारी यात्रा का अगला पड़ाव चुय मल (Chuimal Taalab) का तालाब था  जो nuh की खूबशुरती में चार चाँद लगाता है best place nuh भी कहते हैं , (जिसे चुय मल सेनोटाफ या चुय मल तालाब के नाम से भी जाना जाता है)। चुई मल तालाब वास्तव में बहुत सुंदर है (यहां तक     कि कचरा और शैवाल तैरते हुए भी) और यदि आप नुह क्षेत्र में हों तो यह देखने लायक है। चुय मल का तालाब हरियाणा के मेवात जिले के नुखा में स्थित कब्रों वाला एक पत्थर का तालाब है।

इसका इतिहास सेठ चूयमल ने लोगों की प्यास बुझाने के लिए बनाया था। ईस तलाब को आज 500 साल के आसपास हो चुके हैं। ईसमें Shiv Temple, Hanuman Mandir, भी मोजूद है। इस तालाब के पास ही एक भव्य छतरी बनी हुई है, जिसे सेठ चूहीमल के देहांत के बाद उसके पुत्र स्वर्गीय सेठ हुकम चंद ने उनकी याद में बनवाया इस छतरी पर दुर्लभ मीनाकारी चित्रित की गई है।

इसके अतिरिक्त इस तालाब के साथ मंदिर का निर्माण कराया गया था जिसमें शिव, हनुमान और दुर्गामां की मूर्तियां स्थापित हैं। इस तालाब के मालिक और सरकार की उपेक्षा के चलते यह ऐतिहासिक तालाब अब खण्डहर हो रहा है। कस्बे के लोग इसमें कपड़े धोते हैं। अब यह तालाब बदहाल हो चुका है। नूंह के नन्हे, अक्षय कुमार, साकिर आदि लोगों का कहना है कि अगर सरकार इस तालाब को अपने कब्जे में लेकर इसको विकसित करे तो यह खूबसूरत पर्यटन स्थल बन सकता है।

ग्रामीणों ने बताया कि सेठ चूहीमल की हवेली से एक सुरंग सीधी तालाब तक आती है। बताया जाता है कि उस दौरान सेठानी इस सुरंग के जरिये स्नान करने आती थी। इस बात की तसदीक सेठ चूड़ीमल की सातवीं पीढ़ी के वंशज वेद प्रकाश करते हैं। उन्होंने बताया कि जब वह छोटे थे, उस समय उनके पिता ने यह सुरंग का दरवाजा बंद करा दिया था। उनका कहना है कि इस सुरंग में पानी भरा रहता था और सांप व अन्य जानवरों के घर में घुसने का खतरा बना रहता था।

नूंह हरियाणा के मेवात जिले में स्थित है, जो कई स्मारकों और स्थलों वाला एक शहर है, जो इसे एक दिलचस्प दिन की यात्रा बनाता है। हरियाणा के नूंह क्षेत्र में करने के लिए चीजों की एक त्वरित ऑनलाइन खोज और नूंह क्षेत्र में मुख्य आकर्षण एक सुंदर मंदिर द्वार और पृष्ठभूमि में अरावली के साथ एक सुंदर तालाब बन गया। हरियाणा के नूंह जिले में सबसे लोकप्रिय आकर्षणों में से एक mewat history सदियों  पुराना शिव मंदिर है, जहां पांडव पांडव के निर्वासन के दौरान रुके थे।

 


Firozpur Jhirka का इतिहास क्या है best place mewat

हमारी यात्रा का अगला पड़ाव है। फिरोजपुर झिरका। राजधानी दिल्ली से 110 और गुडग़ांव से लगभग 70 और नूंह से 40 किलोमीटर की दूरी पर मेवात के कस्बा फिरोजपुर झिरका की अरावली पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित प्राचीन शिव मंदिर का अनूठा इतिहास है। firozpur jhirka को मेवात के best place इसीलिए गिना जाता है के यहाँ , कई मंदिरों की  मान्यता है-कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इस रमणीक स्थल पर पूजा-अर्चना कर शिवलिंग की स्थापना की थी।

 

अनूठा है इस प्राचीन मंदिर का इतिहास, जानिए कैसे बना था शिवलिंग firozpur jhirka

mewati history मान्यता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इस रमणीक स्थल पर पूजा-अर्चना कर शिवलिंग की स्थापना की थी। तभी से यह जगह तपोभूमि के रूप में विख्यात है। इस पांडवकालीन मंदिर में वर्ष में दो बार शिव रात्रि पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश सहित दिल्ली से बहुत अधिक संख्या में शिव भक्त यहां आते हैं। िव मंदिर के बारे में अनेक कहावतें भी प्रचलित हैं। कहा जाता है कि यहां पवित्र गुफा में शिव लिंग के दर्शन मात्र से ही जन्म जन्मांतर के दुखों का निवारण हो जाता है।

यहां की पर्वत मालाओं से बहते प्राकृतिक झरने में स्नान करने से सभी तरह के चर्म रोग भी दूर हो जाते हैं। इसके अलावा शिव लिंग पर जलाभिषेक करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। अरावली पर्वत श्रृंखलाओं की हरियाली सैलानियों व भक्तों का मन मोह लेता है। वहीं, कल-कल की ध्वनि के साथ बहता प्राकृतिक झरना असीम शांति देता है। तभी से यह  best place mewat की लिस्ट में सामिल kiya जाता है |


mewat history सन् 1846 के तत्कालीन तहसीलदार जीवन लाल शर्मा को अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं में शिव लिंग का सपना आया था। इसका अनुसरण करते हुए तहसीलदार ने पवित्र शिवलिंग खोज निकाला। इसके बाद उस स्थान पर पूजा-अर्चना शुरू कर दी गई। धीरे-धीरे श्रद्धालुओं का जमघट लगना शुरू हो गया। यहां शिव रात्रि के मौके पर मेले में श्रद्धालु नीलकंठ, गौमुख व हरिद्वार से पवित्र कांवड़ लेकर यहां आते हैं। इसके अलावा क्षेत्र की नवविवाहित महिलाएं पुत्र प्राप्ति के लिए शिव लिंग पर दोघड़ चढ़ाती हैं।

शिव मंदिर विकास समिति के अध्यक्ष अनिल गोयल के मुताबिक यहां आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए धर्मशालाएं बनी हैं। वर्ष भर इस धार्मिक स्थल पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मान्यता है कि शिव रात्रि पर भोले भंडारी किसी न किसी रूप में अपने भक्तों को अवश्य दर्शन देते हैं। आस्था-प्राचीन समय से यहां एक कदम का वृक्ष है।

मान्यता है कि इसपर अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए जो सच्चे मन से रिबन, धागा बांधता है, उसकी मुराद अवश्य पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने पर भक्तजन यहां मंदिर परिसर में भंडारा करते हैं। दूर तक पेट के बल बच्चे, महिलाएं व पुरुष (दंडोती) लगा कर अपनी मन्नतें मांगते हैं। mewat history मंदिर के महंत मौनी बाबा के नाम से विख्यात हैं, जिन्होंने लगातार 12 वर्ष तक मौन व्रत रख कठोर तपस्या की थी।

 

best place mewat शाह चोखा की दरगाह

नूंह: जिले के कस्बा पिनगवां से सटे गांव खोरी शाह चोखा के पहाड़ की चोटी में बनी वर्षों पुरानी दादा चौखा की दरगाह अपने आप में अनूठा mewati history समेटे हुए है. मेवात में ना जाने कितने किस्से हैं,  जिसने भारत के इतिहास को अहम किरदार दिए।  ऐसे ही कुछ किस्सों  और इतिहास को ढूंढते हुए best place mewat मैं हम आ गए हैं विभाग के एक छोटे से गांव शाह चोखा में।



इस गांव में 500 साल पूरानी दादा चौखा शाह की मजार है। यह मजार इतनी ऐतिहासिक है के यहां बड़े-बड़े लोग दूर-दूर से आते हैं। इस मजार के बारे में हमने यहां सुना था के बादशाह अकबर भी यहां अक्सर आया जाया करते थे, और यहीं उन्होंने मन्नत मांगी थी, अपने बेटे के लिए। old mewat history

बड़कली-पुन्हाना मार्ग पर बसा शाह चौखा गांव की ये मजार सैकड़ों फीट ऊंचाई पर बनी है. इलाके में हिन्दू-मुस्लिम के साथ सभी धर्मों के लोग यहां मुराद मांगने और चादर चढ़ाने आते हैं. इस दुर्गम जगह पर बनी शाह चौखा की मजार के पीछे भी एक कहानी है. गांव वाले बताते हैं कि 500 साल पहले जब दादा शाह चौखा इसी जगह पहाड़ पर बैठे थे, तो कुछ लोग उनसे पूछने लगे कि आप कौन हो..? कहां से आये हो..? शाह चौखा ने उनसे बात की तो ग्रामीण उनसे संतुष्ट हुए और गांव में लोगों को बताया कि पहाड़ पर चोखो आदमी है, यानी बढ़िया शख्सियत है। उसी दिन से उनका नाम दादा शाह चौखा पड़ गया।

 

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Monday, November 11, 2024

झूठा दिखावा
 

नमस्कार आज की हमारी यह हिंदी कहानी है दुनिया का झूठा दिखावा यह कहानी एक रियल लाइफ में बैठती है। 


आज की इस कहानी में हम झूठा दिखावा को एक कहानी के माध्यम से जानने  की कोशिश करेंगे, ताकि आप समझ सके कि यह दुनिया क्या है और इसका क्या मकसद है, क्या यह हमारे हाथ लग पाएगी या नहीं तो चलिए आज जानते झूठा दिखावा की हिस्ट्री को। 


बंदरों का बड़ा झुंड ~ दुनिया का झूठा दिखावा?

monkey jhund


एक जंगल में बंदरों का बड़ा झुंड था । उस जंगल में खाने पीने की कोई कमी नहीं थी इसलिए सारे बंदर बहुत आराम और संतुष्ट होकर रहते थे।



एक दिन एक वैज्ञानिक अपनी बेटी के साथ उसी जंगल में शोध करने के लिए आया। अपना तम्बू लगाने के बाद वैज्ञानिक पौधों के नमूने इकट्ठा करने के लिए बाहर निकला ।


लेकिन लड़की तम्बू की सुंदरता को देखकर रुक गयी। उसने पहले ज़मीन पर एक पुराना कालीन रखा और उस पर एक बिस्तर बिछाया। तम्बू के बीच लालटेन लटकाई और उसके नीचे एक छोटी मेज़ और सफेद सेब से भरा कटोरा  रख दिया। 


वह सेब देखने में बहुत ताज़ा, खुबसूरत और बड़े  लग रहे थे। सारे बन्दर लालच से उस कृत्रिम सेब को पेड़ों पर बैठे देख रहे थे। 


तम्बू के सामने जगह साफ करने के लिए लड़की बाहर निकली, तब एक बंदर ने तेज़ी से झपटा मारा और एक कृत्रिम सेब उठा लिया। तभी उसी समय लड़की की नज़र भी उस पर पड़ गयी, लड़की ने तुरंत बंदूक उठाकर निशाना लगाया और गोली दाग दिया, लेकिन सभी बंदर इतनी देर में वहां से भाग गए।


काफी देर के बाद सारे बन्दर रुक गए जब उन्होंने देखा कि अब उनका कोई पीछा नहीं कर रहा है। 


चोर बंदर ने हाथ उठाकर सबको सेब दिखाया। सभी बंदर हैरत से और ललचाई नज़र से उस बंदर को देखने लगे कि उसे कितना अच्छा सेब मिला है ।सभी इस कृत्रिम सेब को हाथ लगाने की कोशिश करने लगे।


झूठा दिखावा चोर बंदर

monkey झूठा दिखावा


चोर बंदर ने सबको फटकार कर ये कृत्रिम सेब लिया और एक पेड़ की सबसे ऊंची शाख पर जाकर सेब खाने के लिए मुंह में दबा दिया।


 कृत्रिम सेब बेहद कड़े प्लास्टिक से बना था । बंदर के दांतों में चबाने से दर्द शुरू हो गया। बंदर ने दो तीन बार और कोशिश की लेकिन हर बार दर्द होने लगा। लेकिन झूठा दिखावा करने की वजह से उसने किसी से कुछ नहीं कहा। 


उस दिन चोर बंदर ने पेड़ की उसी शाखा पर भूखा रहकर गुज़ारा । अगले दिन वह पेड़ से नीचे आया ।


सभी बंदरों ने उसे सम्मान से देखा, क्योंकि उसके हाथ में वो कृत्रिम सेब मौजूद था। दूसरे बंदरों से मिलने वाला सम्मान को देखकर चोर बंदर ने सेब पर पकड़ मज़बूत बना ली। 


अब दूसरे बंदर फलों की तलाश में निकले और एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक कूद कर फल तोड़ तोड़कर खाने लगे।


चोर बंदर के एक हाथ में  कृत्रिम सेब था,इसलिए वो पेड़ पर नहीं चढ़ सका।कहीं झूठा दिखावा की झलक कम ना पड़ जाये।  वो सेब को हाथ से नहीं छोड़ना चाहता था इसलिए वह दिन भर भूखा प्यासा रहा और यही सिलसिला आगे कुछ दिन तक चलता रहा। 

apple


हालांकि दूसरे बंदर उसके हाथ में कृत्रिम सेब देखकर उसका सम्मान करते लेकिन उसे खाने के लिए कुछ भी नहीं देते। जिससे चोर बंदर काफी कमजोर हो गया।  लेकिन झूठा दिखावा तो झूठा दिखावा ही है, चाहे इंसान करे या फिर बंदर। 



चोर बंदर मौत 

चोर बंदर


चोर बंदर भूख से इतना निढाल हो गया था कि अब उसे अपना आखिरी वक़्त नज़र आने लगा। पर सेब को बिलकुल नहीं छोड़ा झूठा दिखावा जो था उसका कैसे अपनी इज्जत को खोता जो बंदरों से मिली। उसने एक बार फिर उस सेब को खाने की कोशिश की लेकिन इस बार नतीजा अलग नहीं था। उसके दांत इस बार भी दर्द कर रहे थे ।


 चोर बंदर को आँखों के सामने पेड़ों से लटका हुआ फल दिखाई दे रहा था। लेकिन इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह इन पेड़ों पर चढ़ सके। धीरे धीरे उसकी आँखें हमेशा के लिए बंद हो गई। जैसे ही उसकी जान निकली कृत्रिम सेब पर पकड़ ढीली होने से वो उसके हाथ से बाहर लुढ़क गया।


शाम को बाकी बंदर, मरे बंदर के पास आए, कुछ आंसू बहाये और उसके शरीर को पत्तों से ढक दिया। जब वो ये कर रहे थे तब एक और बंदर को एक कृत्रिम सेब मिला और उसने अपना हाथ  ऊँचा कर के सभी बंदरो को सेब दिखाना शुरू कर दिया।

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consultation

Consultation 

दुनिया की मिसाल इस प्लास्टिक के सेब की तरह है, इससे कुछ नहीं मिलता। जबकी इसे देखने वाले प्रेरित होते रहते हैं और दुनिया को हाथ में रखने का दावेदार आख़िर में ख़ाली हाथ इस दुनिया से चला जाता है। कोई और आकर उसकी दुनिया पर क़ब्ज़ा कर लेता है। "झूठा दिखावा इंसान को पहले थका देता है और फिर मार डालता है।"


आज की इस हिंदी स्टोरी Hindi Story का सार यही था। ताकि आप मोटिवेशनल हो जाये।  सेब और हेल्थ से जुडी जानकारी जानने के लिए।  health क्या है।  



history Qutubuddin aibak kaun tha कुतुबुद्दीन ऐबक कौन था, Iltumish kon tha  इल्तुतमिश कौन था  Who was ilttumish, Iltutmish's death इल्तुत्मिश के देहांत, रज़िया सुल्तान कोन थी Razia Sultan Kon Thi




कुतुबुद्दीन ऐबक कौन था ‌~ Qutubuddin aibak kaun tha


कुतब-उद-दीन ऐबक, मुहम्मद गौरी के सिपाहसालार के साथ उसका ग़ुलाम भी था | कुतब -उद-दीन ऐबक का जन्म मध्य एशिया के तुर्की परिवार में हुआ था और उसे बचपन में ही ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया गया था | सुल्तान मुहम्मद गौरी के राजपाल होने के कारण कुतब-उद-दीन ने बनारस को 1194 A D में बर्खास्त कर दिया | इसने अजमेर के राजा को भी हराया | इसने ग्वालियर पर विजय प्राप्त करने के बाद राजा सोलंखोल से ज़बरदस्ती शुल्क अदा करवाया | इसके अलावा, इसने गुजरात के राज्यों पर भी विजय हासिल की |



दिल्ली सल्तनत : गुलाम वंश का शासन (1206A . D. -1290 A . D .) हिस्ट्री कुतब-उद-दीन ऐबक,हूं दिल्ली सल्तनत गुलाम वंश इल्तुत्मिश, कुतब-उद-दीन ऐबक ( 1206-11) का उत्तराधिकारी बना जिसके बाद रज़िया (1236-40) और बलबन (1265-85) ने राजभार संभाला | कुतब-उद-दीन ऐबक ने क़ुतुब मीनार की नींव रखी परंतु इल्तुत्मिश ने इसे पूरा कराया था | चौगान खेलने के दौरान अपने घोड़े से गिरने के कारण कुतब-उद-दीन की मृत्यु हो गई |




1206 A D  में मुहम्मद गौरी की हत्या के बाद, कुतब-उद-दीन ऐबक भारत का सुल्तान बन गया और  ममेलुक वंश या दास वंश परंपरा की नींव रखी |1206 A D में इसे मुहम्मद गौरी के द्वारा नैब-उस-सल्तनत ( गौरी के भारतीय। साम्राज्य के राजपाल ) के तौर पर नियुक्त कर दिया 

कुतब-उद-दीन ऐबक से जुड़े कुछ मुख्य तथ्य निम्न हैं:



इसने सिर्फ 4 साल के किए शासन किया | चौघन खेलने के दौरान 2010 में इसकी मृत्यु हो गई |कुतब-उद-दीन दिल्ली सल्तनत का प्रथम शासक था |वह अय्बक जाति का तुर्क था |दयालु होने के कारण इसे सुल्तान “लाख बक्ष” भी कहा गया |कुतब-उद-दीन ऐबक को कुतुब मीनार की नींव रखने का श्रेय जाता है जिसका नाम सूफी संत ख्वाजा कुतब –उद-दीन बख्तियार काकी के ऊपर रखा गया था |इसने क़ुतुब अल इस्लाम मस्जिद का भी कार्यभार संभाला |इसके दामाद इल्तुत्मिश ने इसकी मृत्यु के बाद कार्यभार संभाला |कुतब-उद-दीन ऐबक का किला पाकिस्तान के लाहौर में है |


इल्तुत्मिश  : Iltumish kon tha ~ इल्तुतमिश कौन था ~ Who was ittumish


यह इल्लाबरी जाति का तुर्क था | वह ऐबक का दामाद था और ऐबक की मृत्यु के बाद दिल्ली का अगला सुल्तान बना | उसके नाम से दिल्ली के निकट महरौली में हौज़-इ-शमशि नामक इमारत है | इसने क़ुतुब मीनार का कार्य पूरा कराया जिसे इसके पूर्वजों ने आरंभ किया था |

इल्तुत्मिश ने दिल्ली सल्तनत Delhi Sultanate में इक्ता प्रणाली की भी शुरुआत की जिसमे खेती पर कर की प्रथा थी | इक्ता प्रणाली के अंतर्गत, एक अधिकारी को राज्य से तनख्वा के बदले  में राजस्व कर का अनुदान दिया जाता था |हालांकि, इक्ता प्रणाली वंशानुगत नहीं थी | इक्ता प्रणाली ने सल्तनत के दूर के भागों को केंद्र सरकार से जोड़ दिया था |

चांदी टांका और ताँबा जीटल की शुरुआत का श्रेय भी इल्तुत्मिश को जाता है | चाँदी टांके का वज़न 175 इकाई था |

हिस्ट्री ऑफ़ बाबर बाबर ने हिंदुस्तान में कब और कैसे और कहां कहां राज किया जाने हिंदी में इल्तुत्मिश के शासन के दौरान चेंगेज़ खान के नेतृत्व में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण किया | परंतु उन्होने जल्द ही भारत को छोड़ दिया और मुल्तान, सिंध और क़बचा की तरफ चले गए |


history Iltutmish's death ~ इल्तुत्मिश के देहांत


इल्तुत्मिश के देहांत के बाद रज़िया दिल्ली सल्तनत की सुल्तान बन गई | परंतु यह इसके लिए आसान नहीं था | सुल्तान बनने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि इल्तुत्मिश ने अपने सभी पुत्रों को अवगुणता पाई और रज़िया राजगद्दी को संभालने के लिए प्रत्येक रूप से उपयुक्त थी | इसलिए, इल्तुत्मिश ने रज़िया को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया | परंतु छिहल्गनी या मुख्य चालीस तुर्कियों ने इल्तुत्मिश की अंतिम इच्छा का विरोध किया और उसके पुत्र रुक्नउद दीन फिरूज़ को राजगद्दी पर बैठा दिया |


रज़िया सुल्तान कोन थी ~ Razia Sultan Kon Thi


रुक्न उद दीन फिरूज़ अयोग्य था और अपने ही इंद्रिय आनंदों में ज्यादा व्यस्त हो गया तथा राज्य के मसले अव्यवस्थित हो गए | 7 महीनो के अंदर ही रुक्न उद दीन फिरूज़ की  हत्या कर दी गई | 1236 A D  में रज़िया ने  रुक्न उद दीन के बाद पदभार संभाला | रज़िया ने 1240 तक साड़े तीन साल तक शासन किया | यद्यपि, एक अच्छे शासक के सभी गुण रज़िया में मौजूद दे परंतु छिहल्गनी ( 40 तुर्की अधिकारियों का दल ) ने कभी भी औरत के शासन को स्वीकार नहीं किया |उन्होने रज़िया के खिलाफ विद्रोह किया जब उसने अपने पसंदीदा याक़ूत को अस्तबलों का संचालक नियुक्त कर दिया | याक़ूत अबिसीनियल था जिसने तुर्क-अफ़गान वंशों में ईर्ष्या जगाई |


विद्रोही मुखियों को  भटिंडा के राजपाल, मलिक अल्तुनीय का साथ मिला | जल्दी ही दो विद्रोही दलों के बीच में युद्ध हुआ जिसमे याक़ूत मारा गया और रज़िया को बंदी बना लिया गया |


रज़िया ने अल्तुनीय से विवाह किया और दोनों ने मिलकर दिल्ली सल्तनत को वापिस पाना चाहा जिस पर रज़िया के भाई मुईज़ुद्दीन बहराम शाह ने कब्जा कर रखा था | हालांकि, रज़िया और उसका शौहर हार गए और उन्हे वहाँ से भागने के लिए मजबूर कर दिया गया | कैथल की तरफ भागने के दौरान जाटों ने इन्हे पकड़ लिया और इनकी  हत्या कर दी |  

मुईज़ुद्दीन बहराम ने दो साल के लिए  शासन किया जो कि हत्याओं और धोखेबाज़ी से भरा था | बाद में उसकी सेना ने ही उसकी हत्या कर दी | परिणाम स्वरूप  इस काल ने दिल्ली सल्तनत के सिंहासन पर कुछ कठपुतली राजाओं को बैठे देखा  |

नसीर-उद-दीन महमूद , इल्तुत्मिश के सबसे छोटे पुत्र ने 1246 से 1266 तक शासन किया, जिसे तुर्क अधिकारी बलबन ने काम मे सहायता की | बाद में बलबन नसीर-उद-दीन महमूद का उत्तराधिकारी बना |



दोस्तों आप हमें कमेंट करके बता दीजिए कि आपको इनमें से कौन से राजा ज्यादा पसंद है और कौन से राजा का शासन आपको ज्यादा अच्छा लगता है इनमें से भी नहीं है आप यह बताइए कि सबसे ज्यादा शासन आपको किस राजा का अच्छा लगता था साथ में हमें फॉलो भी कीजिए




Friday, November 1, 2024




नमस्कार दोस्तों! आज मैं आपके लिए लेकर आई हूं एक शानदार और दिलचस्प "अकबर-बीरबल की कहानी Story of Akbar-Birbal" जो हमें न केवल मनोरंजन देती है, बल्कि इसके पीछे एक महत्वपूर्ण सीख भी छुपी है।

प्रस्तावना: अकबर और बीरबल का अद्वितीय संबंध


अकबर-बीरबल की कहानियाँ भारतीय इतिहास और लोककथाओं का एक अभिन्न हिस्सा हैं। बादशाह अकबर, जो अपने समय के एक शक्तिशाली और विद्वान शासक माने जाते थे, अपने दरबार में अनेक गुणी और चतुर लोगों को जगह देते थे। इन सब में सबसे अधिक प्रसिध्द और बुद्धिमान थे बीरबल। बीरबल की बुद्धिमानी, हाजिरजवाबी और व्यंग्यात्मक शैली ने उन्हें अकबर के सबसे प्रिय दरबारियों में से एक बना दिया था।

अकबर को न केवल बीरबल की सलाह पसंद थी, बल्कि उन्हें अपने मन में उठने वाले अजीबोगरीब सवालों और विचारों के लिए भी बीरबल से राय लेना अच्छा लगता था। यही कारण है कि अकबर और बीरबल के बीच के संवाद अक्सर मनोरंजक, ज्ञानवर्धक और हाजिरजवाबी से भरे होते थे। ऐसे ही एक घटना की कहानी है, जो यह बताती है कि कैसे अकबर के एक अनोखे विचार पर बीरबल ने अपने मजाकिया अंदाज़ में प्रतिक्रिया दी और अकबर को सच्चाई का एहसास कराया।

कहानी का आरंभ: अकबर का विचित्र विचार


यह घटना उस समय की है जब बादशाह अकबर अपने दरबार में नई-नई योजनाओं और सुधारों पर विचार कर रहे थे। एक दिन अकबर के मन में एक अजीब और अनोखा विचार आया। उन्होंने सोचा, "क्यों न हम इस राज्य में एक नया नियम बनाएं जिसमें दो माह का एक माह कर दिया जाए।" उन्होंने सोचा कि इस नियम के माध्यम से उनका नाम हमेशा के लिए इतिहास में अमर हो जाएगा, और लोग उन्हें एक अनोखे शासक के रूप में याद रखेंगे।

बादशाह ने अपने इस विचित्र विचार को बीरबल के सामने रखा और उससे मशवरा किया। उन्होंने बीरबल से कहा, "बीरबल, मैं चाहता हूं कि दो महीने का एक महीना बना दिया जाए। इससे हमारा नाम इतिहास में युगों-युगों तक चलता रहेगा, और लोग हमें एक महान और अनोखे बादशाह के रूप में जानेंगे।"

बीरबल का कटाक्ष और बुद्धिमानी


बीरबल ने बादशाह की इस बात को ध्यान से सुना और फिर अपने कटाक्ष पूर्ण अंदाज में मुस्कराते हुए बादशाह से कहा, "वाह, आलमपनाह! आपने तो बहुत ही अनोखा और अद्वितीय विचार पेश किया है। यदि दो महीने का एक महीना बना दिया जाए तो यह संसार के लिए एक अद्भुत उपकार होगा।"

बीरबल ने यह कहते हुए आगे कहा, "इस नए नियम के अनुसार, जब दो महीने एक महीने में सिमट जाएंगे, तब 15 दिन की जगह चांदनी एक माह तक रहेगी। इस तरह चंद्रमा भी हमारी कृपा से अधिक दिनों तक लोगों को रौशनी प्रदान करेगा।" बीरबल के इस व्यंग्य को सुनकर दरबार में बैठे अन्य लोग मुस्कुरा उठे, और बादशाह खुद भी समझ गए कि बीरबल इस बात का मजाक बना रहे हैं।

प्रकृति के नियमों का महत्व


बीरबल की चतुराई और कटाक्ष ने बादशाह अकबर को यह एहसास दिला दिया कि प्रकृति के नियमों में हस्तक्षेप करना या उन्हें बदलना मानव के बस की बात नहीं है। चंद्रमा, सूर्य, और पृथ्वी के अपने-अपने नियम हैं, जिनका संचालन मनुष्य नहीं कर सकता। बादशाह अकबर ने तुरंत ही अपना विचार वापस ले लिया और समझ गए कि उनकी यह सोच व्यर्थ थी।

सीख और संदेश


इस "Story of Akbar-Birbal" से हमें यह सीख मिलती है कि चाहे इंसान कितना भी शक्तिशाली और विद्वान क्यों न हो, प्रकृति के नियमों के साथ खिलवाड़ करना संभव नहीं है। यह भी एक संदेश है कि कभी-कभी हमें अपने अजीब और अनावश्यक विचारों को नियंत्रित करना चाहिए और यथार्थ को समझकर चलना चाहिए।


Story of Akbar-Birbal का महत्व


अकबर-बीरबल की कहानियाँ भारतीय History सभ्यता और संस्कृति में विशेष स्थान रखती हैं। ये कहानियाँ न केवल हमें हंसाने का काम करती हैं, बल्कि इनमें हमें जीवन के अनमोल सबक भी मिलते हैं। अकबर और बीरबल का अनोखा संबंध, जहां बादशाह अकबर अपनी शक्ति और बुद्धि का प्रदर्शन करते हैं, वहीं बीरबल अपनी सूझ-बूझ और हाजिरजवाबी से उन्हें सही राह दिखाते हैं। इन कहानियों में बीरबल की बुद्धिमत्ता और ज्ञान का परिचय मिलता है, जिससे हमें सीखने को मिलता है कि कैसे कठिन परिस्थितियों में भी हास्य और तर्क से काम लिया जा सकता है।

निष्कर्ष Story of Akbar-Birbal


इस तरह की "Story of Akbar-Birbal" से न केवल हमारे मन को खुशी मिलती है, बल्कि हमारे सोचने के तरीके को भी बदलने का अवसर मिलता है। ऐसे मनोरंजक और शिक्षा से भरे किस्से हमें अपने दैनिक जीवन में छोटी-छोटी समस्याओं को हल करने में भी प्रेरणा देते हैं। अकबर और बीरबल का यह रिश्ता हमें सिखाता है कि जीवन में बुद्धि, हास्य और व्यंग्य से कई मुश्किलें सुलझाई जा सकती हैं, और यह भी कि प्रकृति के नियमों का सम्मान करना चाहिए।

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