Sakunat History World | Indian, World & Mewat History in Hindi

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Sunday, July 30, 2023

hindi kahani Motivational


आज की इस हिंदी कहानी hindi kahani में मैं आप लोगों के लिए लेकर आई हूं जूते पॉलिश करने वाला एक लड़का।

In today's Hindi story, I have brought for you a boy who polishes shoes.

 

hindi kahani जूते पॉलिश करने वाला एक लड़का 

एक सज्जन रेलवे स्टेशन पर बैठे गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे तभी जूते पॉलिश करने वाला एक लड़का आकर बोला~ ‘‘साहब! बूट पॉलिश कर दूँ ?’’

उसकी दयनीय सूरत देखकर उन्होंने अपने जूते आगे बढ़ा दिये, बोले- ‘‘लो, पर ठीक से चमकाना।’’

लड़के ने काम तो शुरू किया परंतु अन्य पॉलिशवालों की तरह उसमें स्फूर्ति नहीं थी।

वे बोले~ ‘‘कैसे ढीले-ढीले काम करते हो? जल्दी-जल्दी हाथ चलाओ !’’ 

वह लड़का मौन रहा। 

इतने में दूसरा लड़का आया। उसने इस लड़के को तुरंत अलग कर दिया और स्वयं फटाफट काम में जुट गया। पहले वाला गूँगे की तरह एक ओर खड़ा रहा। दूसरे ने जूते चमका दिये।

‘पैसे किसे देने हैं?’ इस पर विचार करते हुए उन्होंने जेब में हाथ डाला। उन्हें लगा कि ‘अब इन दोनों में पैसों के लिए झगड़ा या मारपीट होगी।’ फिर उन्होंने सोचा, ‘जिसने काम किया, उसे ही दाम मिलना चाहिए।’ इसलिए उन्होंने बाद में आनेवाले लड़के को पैसे दे दिये।

उसने पैसे ले तो लिये परंतु पहले वाले लड़के की हथेली पर रख दिये। प्रेम से उसकी पीठ थपथपायी और चल दिया।

वह आदमी विस्मित नेत्रों से देखता रहा। उसने लड़के को तुरंत वापस बुलाया और पूछा~  ‘‘यह क्या चक्कर है?’’

लड़का बोला~ ‘‘साहब! यह तीन महीने पहले चलती ट्रेन से गिर गया था। हाथ-पैर में बहुत चोटें आयी थीं। ईश्वर की कृपा से बेचारा बच गया नहीं तो इसकी वृद्धा माँ और बहनों का क्या होता,बहुत स्वाभिमानी है... भीख नहीं मांग सकता....!’’

फिर थोड़ा रुककर वह बोला ~ ‘‘साहब! यहाँ जूते पॉलिश करनेवालों का हमारा समूह है और उसमें एक देवता जैसे हम सबके प्यारे चाचाजी हैं जिन्हें सब ‘सत्संगी चाचाजी’ कहकर पुकारते हैं। वे सत्संग में जाते हैं और हमें भी सत्संग की बातें बताते रहते हैं। उन्होंने ही ये सुझाव रखा कि ‘साथियो! अब यह पहले की तरह स्फूर्ति से काम नहीं कर सकता तो क्या हुआ???

ईश्वर ने हम सबको अपने साथी के प्रति सक्रिय हित, त्याग-भावना, स्नेह, सहानुभूति और एकत्व का भाव प्रकट करने का एक अवसर दिया है।जैसे पीठ, पेट, चेहरा, हाथ, पैर भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी हैं एक ही शरीर के अंग, ऐसे ही हम सभी शरीर से भिन्न-भिन्न दिखाई देते हुए भी हैं एक ही आत्मा! हम सब एक हैं।

स्टेशन पर रहने वाले हम सब साथियों ने मिलकर तय किया कि हम अपनी एक जोड़ी जूते पॉलिश करने की आय प्रतिदिन इसे दिया करेंगे और जरूरत पड़ने पर इसके काम में सहायता भी करेंगे।’’ hindi kahani 

जूते पॉलिश करनेवालों के दल में आपसी प्रेम, सहयोग, एकता तथा मानवता की ऐसी ऊँचाई देखकर वे सज्जन चकित रह गये औऱ खुशी से उसकी पीठ थपथपाई...औऱ सोंचने लगे शायद इंसानियत अभी तक जिंदा है..hindi kahani...!!

 

में सपया सकुनत मेवाती। मेरी यह hindi kahani आप लोगों को पैसे लेगी कमेंट करके जरूर बताएं इसी तरह की हिंदी कहानी पढ़ने के लिए आप मुझे फॉलो जरूर करें और साथ ही में सब्सक्राइब भी कर ले।

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Saturday, July 22, 2023

 Hindi Story ्वास्थ्य ही सबसे बड़ी पूंजी हैं* kahani in hindi, moral stories in hindi,bhutiya kahani, kahaniya, short story in hindi, love story in hindi, bacchon ki kahani

Hindi Story


एक बार की बात है एक गॉव में एक धनी व्यक्ति रहता था। उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी लेकिन वह बहुत ज़्यादा आलसी था। अपने सारे काम नौकरों से ही करता था और खुद सारे दिन सोता रहता या अययाशी करता था। वह धीरे धीरे बिल्कुल निकम्मा हो गया था| उसे ऐसा लगता जैसे मैं सबका स्वामी हूँ क्यूंकी मेरे पास बहुत धन है मैं तो कुछ भी खरीद सकता हूँ। यही सोचकर वह दिन रात सोता रहता था| लेकिन कहा जाता है की बुरी सोच का बुरा नतीज़ा होता है।


बस यही उस व्यक्ति के साथ हुआ। कुछ सालों उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका शरीर पहले से शिथिल होता जा रहा है उसे हाथ पैर हिलाने में भी तकलीफ़ होने लगी यह देखकर वह व्यक्ति बहुत परेशान हुआ। उसके पास बहुत पैसा था उसने शहर से बड़े बड़े डॉक्टर को बुलाया और खूब पैसा खर्च किया लेकिन उसका शरीर ठीक नहीं हो पाया। वह बहुत दुखी रहने लगा| एक बार उस गॉव से एक साधु गुजर रहे थे उन्होने उस व्यक्ति की बीमारी के बारे मे सुना।


सो उन्होनें सेठ के नौकर से कहा कि वह उसकी बीमारी का इलाज़ कर सकते हैं। यह सुनकर नौकर सेठ के पास गया और साधु के बारे में सब कुछ बताया। अब सेठ ने तुरंत साधु को अपने यहाँ बुलवाया लेकिन साधु ने कहा क़ि वह सेठ के पास नहीं आएँगे अगर सेठ को ठीक होना है तो वह स्वयं यहाँ चलकर आए। सेठ बहुत परेशान हो गया क्यूंकी वो असहाय था और चल फिर नहीं पता था। लेकिन जब साधु आने को तैयार नहीं हुए तो हिम्मत करके बड़ी मुश्किल से साधु से मिलने पहुचें| पर साधु वहाँ थे ही नहीं। 

सेठ दुखी मन से वापिस आ गया अब तो रोजाना का यही नियम हो गया साधु रोज उसे बुलाते लेकिन जब सेठ आता तो कोई मिलता ही नहीं था। ऐसे करते करते 3 महीने गुजर गये। अब सेठ को लगने लगा जैसे वह ठीक होता जा रहा है उसके हाथ पैर धीरे धीरे कम करने लगे हैं। अब सेठ की समझ में सारी बात आ गयी की साधु रोज उससे क्यूँ नहीं मिलते थे। लगातार 3 महीने चलने से उसका शरीर काफ़ी ठीक हो गया था। तब साधु ने सेठ को बताया की बेटा जीवन में कितना भी धन कमा लो लेकिन स्वस्थ शरीर से बड़ा कोई धन नहीं होता | 


  *👉शिक्षा*:-

तो मित्रों, यही बात हमारे दैनिक जीवन पर भी लागू होती है पैसा कितना भी कमा लो लेकिन स्वस्थ शरीर से बढ़कर कोई पूंजी नहीं होती..!!


Hindi Story एक बढ़ई कि सच्ची कहानी ~ true storry

एक बढ़ई किसी गांव में काम करने गया, लेकिन वह अपना हथौड़ा साथ ले जाना भूल गया। उसने गांव के लोहार के पास जाकर कहा, 'मेरे लिए एक अच्छा सा हथौड़ा बना दो।

मेरा हथौड़ा घर पर ही छूट गया है।' लोहार ने कहा, 'बना दूंगा पर तुम्हें दो दिन इंतजार करना पड़ेगा।

हथौड़े के लिए मुझे अच्छा लोहा चाहिए। वह कल मिलेगा।'

दो दिनों में लोहार ने बढ़ई को हथौड़ा बना कर दे दिया। हथौड़ा सचमुच अच्छा था। बढ़ई को उससे काम करने में काफी सहूलियत महसूस हुई। बढ़ई की सिफारिश पर एक दिन एक ठेकेदार लोहार के पास पहुंचा।


उसने हथौड़ों का बड़ा ऑर्डर देते हुए यह भी कहा कि 'पहले बनाए हथौड़ों से अच्छा बनाना।' लोहार बोला, 'उनसे अच्छा नहीं बन सकता। जब मैं कोई चीज बनाता हूं तो उसमें अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखता, चाहे कोई भी बनवाए।' हेल्थ टिप्स मेवाती dawakhana 


धीरे-धीरे लोहार की शोहरत चारों तरफ फैल गई। एक दिन शहर से एक बड़ा व्यापारी आया और लोहार से बोला, 'मैं तुम्हें डेढ़ गुना दाम दूंगा, शर्त यह होगी कि भविष्य में तुम सारे हथौड़े केवल मेरे लिए ही बनाओगे। हथौड़ा बनाकर दूसरों को नहीं बेचोगे।' texi चालक की कहानी 


लोहार ने इनकार कर दिया और कहा, 'मुझे अपने इसी दाम में पूर्ण संतुष्टि है। अपनी मेहनत का मूल्य मैं खुद निर्धारित करना चाहता हूं। आपने फायदे के लिए मैं किसी दूसरे के शोषण का माध्यम नहीं बन सकता।


आप मुझे जितने अधिक पैसे देंगे, उसका दोगुना गरीब खरीदारों से वसूलेंगे। मेरे लालच का बोझ गरीबों पर पड़ेगा, जबकि मैं चाहता हूं कि उन्हें मेरे कौशल का लाभ मिले। मैं आपका प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता।'  texi चालक की कहानी


सेठ समझ गया कि सच्चाई और ईमानदारी महान शक्तियां हैं। जिस व्यक्ति में ये दोनों शक्तियां मौजूद हैं, उसे किसी प्रकार का प्रलोभन अपने सिद्धांतों से नहीं डिगा सकता.....!!

कहानी माँ बेटे की फुल स्टोरीज


Sunday, July 16, 2023

 " माँ, मुझे कुछ महीने के लिये विदेश जाना पड़ रहा है।

तेरे रहने का इन्तजाम मैंने करा दिया है

तक़रीबन 32 साल के , अविवाहित डॉक्टर सुदीप ने देर रात घर में घुसते ही कहा...

" बेटा, तेरा विदेश जाना ज़रूरी है क्या ?"


माँ की आवाज़ में चिन्ता और घबराहट झलक रही थी।



" माँ, मुझे इंग्लैंड जाकर कुछ रिसर्च करनी है। वैसे भी कुछ ही महीनों की तो बात है।


" सुदीप ने कहा।


" जैसी तेरी इच्छा।


" मरी से आवाज़ में माँ बोली।


और छोड़ आया सुदीप अपनी माँ 'प्रभा देवी' को पड़ोस वाले शहर में स्थित एक वृद्धा-आश्रम में।


वृद्धा-आश्रम में आने पर शुरू-शुरू में हर बुजुर्ग के चेहरे पर जिन्दगी के प्रति हताशा और निराशा साफ झलकती थी।


पर प्रभा देवी के चेहरे पर वृद्धा-आश्रम में आने के बावजूद कोई शिकन तक न थी।


एक दिन आश्रम में बैठे कुछ बुजुर्ग आपस में बात कर रहे थे। उनमें दो-तीन महिलायें भी थीं।


उनमें से एक ने कहा, " डॉक्टर का कोई सगा-सम्बन्धी नहीं था जो अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया।"


तो वहाँ बैठी एक महिला बोली, " प्रभा देवी के पति की मौत जवानी में ही हो गयी थी।


तब सुदीप कुल चार साल का था।


पति की मौत के बाद, प्रभा देवी और उसके बेटे को रहने और खाने के लाले पड़ गये।


तब किसी भी रिश्तेदार ने उनकी मदद नहीं की। 


प्रभा देवी ने लोगों के कपड़े सिल-सिल कर अपने बेटे को पढ़ाया। बेटा भी पढ़ने में बहुत तेज था, तभी तो वो डॉक्टर बन सका।"


story of mother and son 

वृद्धा-आश्रम में करीब 6 महीने गुज़र जाने के बाद एक दिन प्रभा देवी ने आश्रम के संचालक राम किशन शर्मा जी के ऑफिस के फोन से अपने बेटे के मोबाईल नम्बर पर फोन किया, और कहा, " सुदीप तुम हिंदुस्तान आ गये हो या अभी इंग्लैंड में ही हो ?"


" माँ, अभी तो मैं इंग्लैंड में ही हूँ।" सुदीप का जवाब था।


तीन-तीन, चार-चार महीने के अंतराल पर प्रभा देवी सुदीप को फ़ोन करती उसका एक ही जवाब होता, " मैं अभी वहीं हूँ, जैसे ही अपने देश आऊँगा तुझे बता दूँगा।"


इस तरह तक़रीबन दो साल गुजर गये। अब तो वृद्धा-आश्रम के लोग भी कहने लगे कि देखो कैसा चालाक बेटा निकला, कितने धोखे से अपनी माँ को यहाँ छोड़ गया।


आश्रम के ही किसी बुजुर्ग ने कहा, " मुझे तो लगता नहीं कि डॉक्टर विदेश-पिदेश गया होगा, वो तो बुढ़िया से छुटकारा पाना चाह रहा था।"


तभी किसी और बुजुर्ग ने कहा, " मगर वो तो शादी-शुदा भी नहीं था।"


" अरे होगी उसकी कोई 'गर्ल-फ्रेण्ड' , जिसने कहा होगा


पहले माँ के रहने का अलग इंतजाम करो, तभी मैं तुमसे शादी करुँगी।"


दो साल आश्रम में रहने के बाद अब प्रभा देवी को भी अपनी नियति का पता चल गया। बेटे का गम उसे अंदर ही अंदर खाने लगा। वो बुरी तरह टूट गयी।


दो साल आश्रम में और रहने के बाद एक दिन प्रभा देवी की मौत हो गयी। उसकी मौत पर आश्रम के लोगों ने आश्रम के संचालक शर्मा जी से कहा, " इसकी मौत की खबर इसके बेटे को तो दे दो।


हमें तो लगता नहीं कि वो विदेश में होगा, वो होगा यहीं कहीं अपने देश में।"


" इसके बेटे को मैं कैसे खबर करूँ । उसे मरे तो तीन साल हो गये।"


शर्मा जी की यह बात सुन वहाँ पर उपस्थित लोग सनाका खा गये।


उनमें से एक बोला, " अगर उसे मरे तीन साल हो गये तो प्रभा देवी से मोबाईल पर कौन बात करता था।"


" वो मोबाईल तो मेरे पास है, जिसमें उसके बेटे की रिकॉर्डेड आवाज़ है।" शर्मा जी बोले।


"पर ऐसा क्यों ?" किसी ने पूछा।


तब शर्मा जी बोले कि करीब चार साल पहले जब सुदीप अपनी माँ को यहाँ छोड़ने आया तो उसने मुझसे कहा, " शर्मा जी मुझे 'ब्लड कैंसर' हो गया है। और डॉक्टर होने के नाते मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ कि इसकी आखिरी स्टेज में मुझे बहुत तकलीफ होगी।


मेरे मुँह से और मसूड़ों आदि से खून भी आयेगा। मेरी यह तकलीफ़ माँ से देखी न जा सकेगी।


वो तो जीते जी ही मर जायेगी।  texsi चालक देवेन्द्र की है. की hindi story ~ mewati sapya


मुझे तो मरना ही है पर मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण मेरे से पहले मेरी माँ मरे। मेरे मरने के बाद दो कमरे का हमारा छोटा सा 'फ्लेट' और जो भी घर का सामान आदि है वो मैं आश्रम को दान कर दूँगा।"


यह दास्ताँ सुन वहाँ पर उपस्थित लोगों की आँखें झलझला आयीं।


प्रभा देवी का अन्तिम संस्कार आश्रम के ही एक हिस्से में कर दिया गया। उनके अन्तिम संस्कार में शर्मा जी ने आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के परिवार वालों को भी बुलाया।


*माँ-बेटे की अनमोल और अटूट प्यार की दास्ताँ का ही असर था कि कुछ बेटे अपने बूढ़े माँ/बाप को वापस अपने घर ले गये...!! सफेद मूसली safed musli एक ऐसी सर्वशक्ति जड़ी बूटी है

Saturday, July 8, 2023

 Motivational, आज की hindi story  में मैं आप लोगों को बताऊंगी एक सच्चे भारतीय हीरो टैक्सी चालक देवेंद्र की स्टोरी यह एक सच्ची घटना है जो हाल ही में अभी दिल्ली में हुई है

hindi story


देवेन्द्र मूलतः बिहार के रहने वाले हैं। एक दिन देबेन्द्र की टैक्सी में कश्मीर का निवासी बैठा जिसे एयरपोर्ट से पहाड़गंज तक जाना था। देवेन्द्र ने उसको पहाड़गंज छोड़ा, अपना किराया वसूला और वापिस टैक्सी स्टैंड की ओर चल पड़े। इसी बीच उनकी नज़र गाड़ी में पड़े एक बैग पर गयी। बैग को देखकर देवेंद्र समझ गए कि यह उसी सवारी का बैग है, जिसे कुछ ही समय पहले वह पहाड़गंज छोड़ कर आये हैं। बैग को खोलकर देखा तो उसमें कुछ स्वर्ण आभूषण, एक एप्पल का लैपटॉप, एक कैमरा और कुछ नगद पैसे थे। सब कुछ मिला के लगभग 7 या 8 लाख का सामान था।।


एकदम देबेन्द्र की आँखों के सामने अपनी टैक्सी के फाइनेन्सर की तस्वीर आ गयी। इतने आभूषण बेच कर तो 

उनकी टैक्सी का कर्ज आसानी से उतर सकता था। एक दम से प्रसन्न हो उठे। उनके मन में बैठा रावण जाग उठा। पराया माल अपना लगने लगा। परन्तु जीवन की यही तो विडम्बना है। मन में राम और रावण दोनों निवास करते हैं।


कुछ ही दूर गये थे के मन में बैठे राम जाग उठे। देबेन्द्र को लगा के वह कैसा पाप करने जा रहे थे।

नैतिकता आड़े आ गयी। बड़ी दुविधा थी। एक ओर आभूषण सामने पड़े थे और दूसरी ओर अपनी अंतरात्मा खुद को ही धिक्कार रही थी।


कुछ देर द्वंद चला पर अंत में विजय राम की ही हुई। देवेन्द्र पास के पुलिस स्टेशन गये और बैग ड्यूटी पर मौजूद थानेदार के हाथ में थमा दिया।



थानेदार रह गया भौचक्का।  the police station was stunned


अब थानेदार कभी बैग में पड़े आभूषण देखे और कभी ड्राइवर का चेहरा देखे। थानेदार ने कहा कि तू अगर चाहता तो यह बैग लेकर भाग सकता था। देवेन्द्र ने जवाब दिया - "साहब ! हम "गरीब" हैं, पर "बेईमान" नहीं हैं।"


थानेदार भी निःशब्द हो गया। उसे लगा कि ड्राइवर सच में गरीब तो है किंतु ईमानदार है।


ख़ैर सवारी को उसका बैग सकुशल वापिस मिल गया। देवेन्द्र की ईमानदारी के इनाम के रूप में मालिक ने उसे कुछ रुपये देने की पेशकश की तो देवेन्द्र ने साफ मना कर दिया।


असली कहानी अब शुरू होती है hindi story 


थानेदार ने देवेन्द्र की ईमानदारी की गाथा एक मीडियाकर्मी के आगे सुना दी ।


मीडियाकर्मी भी थानेदार की तरह प्रभावित हो गया। उसने इस ईमानदारी की खबर अखबार में छापने की ठान ली ।

वह देवेन्द्र से मिला और उसका साक्षात्कार लेते हुये पूछा- "अगर बैग में पड़े सामान की कीमत (8 लाख रुपये) उसे मिल जायें तो वह क्या करेगा।"


देवेन्द्र ने कहा कि पहले तो फाइनेन्सर का कर्जा चुकाएगा और फिर अगर सम्भव हुआ तो एक टैक्सी खरीदेगा।


रिपोर्टर ने कहा कि तेरे सर पर कर्ज़ है तो तू बैग लेकर भाग क्यों नहीं गया? देवेन्द्र ने रिपोर्टर से भी यही कहा कि साहब, हम गरीब हैं पर बेईमान नहीं हैं। थानेदार की तरह अब रिपोर्टर भी प्रभावित हुआ।


रिपोर्टर ने उसकी ईमानदारी की गाथा एफ एम चैनल के एक रेडियो जॉकी को बताई। एफ एम रेडियो के ज़रिए देवेन्द्र की कहानी दिल्लीवासियों को सुना दी गई...


साथ ही साथ दिल्ली वालों को देवेन्द्र के कर्ज के विषय में भी बताया गया। इसी के साथ देवेन्द्र का एक बैंक खाता नम्बर भी दिया गया,  जिसमे धनराशि डाल कर वह ईमानदार देवेन्द्र का कर्ज़ उतारने में उसकी मदद कर सकते थे।


केवल 2 घँटे बाद ही...... मात्र 120 मिनट में

दिल्ली ने देबेन्द्र के खाते में 91751 रुपये डलवा दिये।

और 8 लाख रुपये मिल गए मात्र 2 दिन में।


सबने अपनी हैसियत के हिसाब से पैसा दिया। दिलवालो की दिल्ली ने देवेन्द्र की ईमानदारी के उपहार में उसे ऋण मुक्त कर दिया। लाखों लोगों ने उसकी ईमानदारी को सराहा....


देवेन्द्र आज भी कहते हैं कि मन के रावण को राम पर हावी ना होने देना उनके जीवन की सबसे बड़ी जीत थी। अगर वह बैग लेकर भाग जाते तो कर्ज़ा तो उतार लेते पर खुद को कभी माफ नहीं कर पाते।


यह सच सिद्ध हो गया कि मन में बैठा रावण आज की व्यवस्था में हावी है। परन्तु मन में बैठे राम आज भी दशानन का वध करने में सक्षम हैं। अच्छाई और बुराई मे आज भी धागे भर का फासला है। इस ओर गये तो राम और उस ओर गये तो रावण।


गरीब ड्राइवर देवेन्द्र ने दिल की सुनी और दिमाग के तर्क को नकार दिया, अपने संस्कार से सिद्ध किया कि किसी और के परिश्रम से अर्जित धन को हड़पने से धन नहीं आता। ईमानदारी ही जीवन को सुखी और समृद्ध बना सकती है hindi story

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